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Sunday, 2 April 2017

अर्थ आवर (Earth Hour) ? यह क्यों महत्वपूर्ण है


पिछले कुछ दिनों से समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, विभिन्न टीवी चैनलों और इंटरनेट पर अर्थ ऑवर (Earth Hour) की चर्चा चल रही हैl जिसके कारण हर किसी के मन में यह उत्सुकता हो सकती है कि अर्थ ऑवर (Earth Hour)  क्या है और किस कारण से यह इतनी चर्चा में है? इस लेख में हम यही जानने की कोशिश कर रहे है कि आखिर यह अर्थ ऑवर (Earth Hour) क्या है और यह किस प्रकार हमारे लिए महत्वपूर्ण है?

अर्थ ऑवर (Earth Hour) क्या है?

अर्थ ऑवर “विश्व वन्यजीव एवं पर्यावरण संगठन ” द्वारा शुरू किया गया एक अभियान है जिसका उद्देश्य लोगों को बिजली के महत्व के बारे में और पर्यावरण सुरक्षा के बारे में जागरूक करना हैl इसका मुख्यालय सिंगापुर में हैl

अर्थ ऑवर (Earth Hour)  की शुरूआत

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ऑस्ट्रेलियाई लोगों के विचार जानने के उद्देश्य से 2004 में विश्व वन्यजीव एवं पर्यावरण संगठन की ऑस्ट्रेलियाई शाखा और विज्ञापन एजेंसी लियो बर्नेट सिडनी के बीच एक विचार-विमर्श गोष्ठी का आयोजन किया गयाl इस गोष्ठी में हुए विचार-विमर्श के आधार पर 2006 में "द बिग फ्लिक" नाम से एक ऐसे अभियान की रूपरेखा तैयार की गई जिसका उद्देश्य बड़े स्तर पर देश में बिजली के उपकरणों को बंद करना थाl विश्व वन्यजीव एवं पर्यावरण संगठन की ऑस्ट्रेलियाई शाखा ने इस संकल्पना को "फेयरफैक्स मीडिया" और सिडनी के मेयर "लॉर्ड क्लोवर मूर" के सामने प्रस्तुत किया, जिन्होंने इस आयोजन के लिए अपनी सहमति प्रदान की थीl 

परिणामस्वरूप 31 मार्च, 2007 को सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में स्थानीय समय के अनुसार शाम 7:30 बजे पहली बार अर्थ आवर (Earth Hour) का आयोजन किया गया थाl इसके बाद से हर वर्ष मार्च महीने में पूरे विश्व में एक घंटे के लिए अर्थ आवर (Earth Hour) मनाया जाता है और बिजली के सारे बल्बों को बंद कर दिया जाता हैl 

विश्व वन्यजीव एवं पर्यावरण संगठन (WWF)

विश्व वन्यजीव एवं पर्यावरण संगठन (WWF) एक ऐसी संस्था है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी “स्वतंत्र संरक्षण संस्था” (इंडिपेंडेंट कंन्जरवेशन ऑर्गेनाइजेशन) हैl वर्तमान समय में 100 से अधिक देशों में 5 मिलियन से अधिक लोग इस संस्था को स्पोर्ट करते हैं। इस संस्था का उद्देश्य प्रकृति के नुकसान को रोकना और मानव जाति के भविष्य को बेहतर बनाना है।

अर्थ आवर (Earth Hour) 2017 

वर्ष 2017 में अर्थ आवर (Earth Hour) का आयोजन 25 मार्च को रात्रि 8.30 - 9.30 तक किया गया l ऐसी उम्मीद है कि इस अवसर पर दुनिया भर के 172 से अधिक देशों के लगभग 10,400 से अधिक प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक इमारतों की लाइटें बंद की ग l इस अभियान के तहत दुनिया भर के लोगों को बिजली बचाने और पर्यावरण के संरक्षण के लिए जागरूक किया या     


भारत द्वारा ऊर्जा संरक्षण की दिशा में उठाए गए कदम 

कुछ वक्त पहले तक भारत में एडिसन बल्ब का ही इस्तेमाल किए जाते थे, जो तकरीबन पीली रोशनी देते थे और बहुत बिजली खाते थे। इसके बाद हाल के सालों में सीएफएल का प्रयोग किया जाता था और इसके बारे में धारणा यह थी कि यह काफी कम बिजली की खपत करता है और अच्छी दूधिया रौशनी देता हैl हालांकि अब सीएफएल को टक्कर देने के लिए भारतीय बाजार में एलईडी बल्ब भी आ गया है। यह एलईडी बल्ब ना के बराबर बिजली खाता है और बढ़िया रौशनी भी देता हैl

Wednesday, 29 March 2017

जहर बढ़ता गया, जल घटता गया - आमी, राप्ती और रोहिणी

शहरीकरण से नाली-नालों से कीचड़ और प्रदूषण की महामारी का नदियों की तरफ  बढ़ा रुख


एकता सिंह, शोध छात्रा
उद्योगों ने जहां विकास के नए रास्ते खोले, वहीं खुशहाली के लिए कुदरती विरासत में मिले साफ  पानी के ठिकानों को मैला करने का दंश भी बढ़ाया है। कारखानों, औद्योगिक इकाइयों के कचरे के साथ साथ शहरीकरण से नाली-नालों का नदियों की तरफ  बढ़ा रुख देखते-देखते पानी के मूल स्वरूप को लील गया। सिकुड़ती नदियां कीचड़ और प्रदूषण की महामारी का शिकार होती रहीं। नतीजे में पीना तो दूर पानी नहाने लायक भी नहीं बचा। मछली व अन्य जल जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पहुंच चुका है। राप्ती बेरौनक है तो आमी सबसे ज्यादा बदहाल है।

गीडा, रुधौली, मगहर, खलीलाबाद की इकाइयों में ट्रीटमेंट प्लांट की बातें बातों तक सीमित रहने से न सिर्फ प्रमुख नदियां अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हैं बल्कि नदियों के किनारे भूगर्भ जल से लेकर वातावरण तक संक्रमण की सेंध लग चुकी है। आम लोगों की जागरूकता भरी पहल ही जलधार पर जहर की मार को रोक सकती है और जिम्मेदार विभाग और अफसरों को अपने हिस्से के काम को नतीजों तक पहुंचाने के लिए मजबूर कर सकती है।

गंगा को भी प्रदूषित कर रहीं आमी-राप्ती

सहायक नदियों की दशा सुधारे बिना गंगा को सार्थक बनाने की दिशा के प्रयास कामयाबी की मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। राप्ती और आमी का बिगड़ा स्वरूप भी गंगा पर असर डाल रहा है। आमी सोहगौरा में राप्ती में मिलती है तो राप्ती पटना घाट पर घाघरा में। बलिया में घाघरा और गंगा का मिलन होता है। जाहिर है गंगा से जुड़ी श्रद्धा और सम्मान को बनाए रखने के लिए भी राप्ती और आमी को बचाने की पहल करनी होगी

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नदियों में तेजी से घट रही घुलनशील ऑक्सीजन


छिनी मछुआरों की आजीविका 
 
बढ़ते प्रदूषण से नदियों में तेजी से घट रही घुलनशील ऑक्सीजन ने जहां राप्ती और आमी की कुदरती कल-कल छीन ली, वहीं जलीय जंतुओं की अटखेलियां भी पहले जैसी नहीं बचीं। यही वजह है कि नदियों के जरिए घर-परिवार चलाने वाले मल्लाह-मछुआरों में से तमाम के आगे आजीविका का बढ़ा संकट खड़ा हो गया। जानकार बताते हैं कि आमी में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर 4 मिलीग्राम प्रति लीटर के न्यूनतम मानक से भी न्यून स्तर पर पहुंच गया है। 

आमी, राप्ती और रोहिणी के पानी पर आधारित शोध में नदियों ही नहीं आसपास की आबादी तक खतनाक बैक्टीरिया की मौजूदगी देखी गई। नदियों में अकार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से शैवाल बढ़े हैं। नदियों के पानी का बढ़ता तापमान जलीय जंतुओं के जीवन को सबसे बड़ा खतरा है। 
 
-एकता सिंह, शोध छात्रा 

Tuesday, 28 March 2017

Changing Rainfall Patterns Linked To Water Security In India



Changing rainfall is the key factor driving changes in groundwater storage in India, according to a new study led by the Indian Institute of Technology (IIT) Gandhinagar published in the journal Nature Geoscience. The study shows that changing monsoon patterns -- which are tied to higher temperatures in the Indian Ocean -- are an even greater driver of change in groundwater storage than the pumping of groundwater for agriculture.

Agriculture in India relies heavily on groundwater for irrigation, particularly in the dry northern regions where precipitation is scarce. Groundwater withdrawals in the country have increased over tenfold since the 1950's, from 10-20 cubic kilometers per year in 1950, to 240-260 cubic kilometers per year in 2009. And satellite measurements have shown major declines in groundwater storage in some parts of the country, particularly in northern India.
Agriculture in India relies heavily on groundwater for irrigation

"Groundwater plays a vital role in food and water security in India. Sustainable use of groundwater resources for irrigation is the key for future food grain production," says study leader Vimal Mishra, of the IIT Gandhinagar. "And with a fast-growing population, managing groundwater sustainably is going become even more important. The linkage between monsoon rainfall and groundwater can suggest ways to enhance groundwater recharge in India and especially in the regions where rainfall has been declining, such as the Indo-Gangetic Plain."

Groundwater acts like a bank for water storage, receiving deposits from surface water and precipitation, and withdrawals as people pump out water for drinking, industry, and irrigating fields. If withdrawals add up to more than the deposits, eventually the accounts could run dry, which could have disastrous consequences.
Groundwater recharge in India and especially in the regions where rainfall has been declining
"This study adds another dimension to the existing water management framework. We need to consider not just the withdrawals, but also the deposits in the system," says Yoshihide Wada, a study coauthor and the deputy director of the Water program at the International Institute for Applied Systems Analysis (IIASA) in Austria.

By looking at water levels in wells around the country, the researchers could track groundwater replenishment following the monsoons
The issue of groundwater depletion has been a topic of much discussion in India, but most planning has focused on pumping, or the demand side, rather than the deposit side. By looking at water levels in wells around the country, the researchers could track groundwater replenishment following the monsoons. They found that in fact, variability in the monsoons is the key factor driving the changing groundwater storage levels across the country, even as withdrawals increase.

In addition, the researchers found that the monsoon precipitation is correlated with Indian Ocean temperature, a finding which could potentially help to improve precipitation forecasts and aid in water resource planning.


"Weather is uncertain by nature, and the impacts of climate change are extremely difficult to predict at a regional level," says Wada "But our research suggests that we must focus more attention on this side of the equation if we want to sustainably manage water resources for the future."

Monday, 27 March 2017

छतों पर सोलर सेल सौर ऊर्जा और कछुए की रफ्तार से बढ़ता रूफटॉप सोलर पीवी


तमिलनाडु के कमूथी में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पॉवर पार्क


भारत इस साल दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक बन जाएगा. हाल ही में तमिलनाडु के कमूथी में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पॉवर पार्क बना है. मध्य प्रदेश के रीवा में इससे भी बड़ा सोलर पार्क बनने की राह पर है. इसमें दुनिया की सबसे सस्ती सौर विद्युत (2.97 रुपए/यूनिट) पैदा होने का दावा किया गया है.
मध्य प्रदेश के रीवा में बड़ा सोलर पार्क

महीने भर पहले ही देश ने नौ गीगावॉट सौर बिजली क्षमता हासिल की है. हालांकि, सौर ऊर्जा की इस लंबी छलांग के बावजूद वह सेगमेंट कछुए की चाल से आगे बढ़ रहा है, जिस पर कुल सौर ऊर्जा लक्ष्य का 40 फीसदी दारोमदार है. वह सेगमेंट रूफटॉप सोलर पीवी (सोलर फोटोवोल्टैक) का है.
25 जून 2014 को नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने ‘ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप एंड स्मॉल सोलर पॉवर प्लांट प्रोग्राम’ शुरू किया था. इस कार्यक्रम के तहत वर्ष 2022 तक कुल 100 गीगावॉट की क्षमता वाले सौर ऊर्जा प्लांट लगाने हैं. इसमें से 40 गीगावॉट बिजली रूफटॉप सोलर पीवी के जरिए हासिल करनी है. लेकिन, रूफटॉप सोलर पीवी की वर्तमान गति को देखते हुए यह लक्ष्य लगभग नामुमकिन है. विश्लेषण फर्म क्रिसिल रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यदि रूफटॉप सोलर पीवी इंस्टॉलेशन की यही गति बनी रही तो वर्ष 2022 तक महज 12 से 13 गीगावॉट की उत्पादन क्षमता हासिल की जा सकेगी.
ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप एंड स्मॉल सोलर पॉवर प्लांट प्रोग्राम

क्रिसिल रिसर्च के एसोसिएट डायरेक्टर प्रणव मास्टर बताते हैं, 'फिलहाल देश में रूफटॉप सोलर पीवी के जरिए 1.1 गीगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है. 2022 तक 40 गीगावॉट के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अगले पांच साल में 36 गुना उत्पादन बढ़ाना होगा, जो कि वर्तमान परिस्थितियों में बेहद मुश्किल है.'

क्यों रूक रही है ग्रोथ

गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट रूफटॉप सोलर पीवी की रफ्तार रोकने के लिए कारकों को जिम्मेदार ठहराती है. ये कारक हैं, जानकारी का अभाव, स्वीकृति में लगने वाला लंबा समय, सरकारी नीति में जल्दी-जल्दी होने वाले बदलाव और विद्युत वितरण कंपनियों की अरूचि. रूफटॉप सोलर पीवी के क्षेत्र में अन्य राज्यों से बेहतर प्रदर्शन करने वाला कर्नाटक भी सरकारी नीति में बदलावों का खामियाजा भुगत रहा है.
अक्टूबर 2013 में कर्नाटक इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (केईआरसी) ने रूफटॉप सोलर बिजली के लिए 9.56 रुपए प्रति यूनिट का टैरिफ घोषित किय था. हालांकि ये दर उनके लिए ही थी, जिन्होंने केंद्र की ओर से मिलने वाली 30 फीसदी सब्सिडी न ली हो. सब्सिडी लेने वालों के लिए यह दर 7.20 रुपए प्रति यूनिट थी.
बेंगलुरु स्थित शोध संस्थान अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एन्वायरमेंट (एट्री) की फेलो उल्का केलकर कहती हैं, 'ऊंची टैरिफ के चलते राज्य के कई लोग रूफटॉप सोलर पीवी के प्रति आकर्षित हुए. उम्मीद से अधिक आवेदन आ जाने के बाद केईआरसी ने मई 2016 में अचानक टैरिफ को घटाकर 7.08 रुपए प्रति यूनिट (बिना सब्सिडी) और 6.03 रुपए प्रति यूनिट (सब्सिडी के साथ) कर दिया. अचानक टैरिफ में आई गिरावट ने रूफटॉप सोलर के लिए बने उत्साह को खत्म कर दिया है.'

सब्सिडी का गणित

सब्सिडी और गैर-सब्सिडी रूफटॉप सोलर पीवी के लिए टैरिफ की अलग-अलग दरों पर सवाल उठाते हुए उल्का कहती हैं, रूफटॉप सोलर पीवी को बढ़ावा देने के लिए 30 फीसदी सब्सिडी केंद्र सरकार देती है. सब्सिडी लेने वालों को कम टैरिफ मिलने से लोग सब्सिडी के प्रति हतोत्साहित होते हैं. ऐसे में राज्य सरकार और राज्य सरकार की योजना एक-दूसरे की पूरक होने की बजाय विरोधी बन गई हैं.
हालांकि, टैरिफ में कमी के बावजूद केईआरसी द्वारा दी जा रही टैरिफ देश में सबसे अधिक है. उत्तराखंड में बिजली खरीदने का कोई प्रावधान नहीं है. इसी तरह, मध्यप्रदेश में एक यूनिट के महज 2.5 रुपए मिलते हैं. ऐसे में रूफटॉप सोलर पीवी को कैसे रफ्तार मिलेगी और पांच साल में 40 गीगावॉट का लक्ष्य कैसे हासिल होगा? ये बड़े सवाल हैं
सरकार के अधिकारी भी मानते हैं कि 40 गीगावॉट का लक्ष्य बहुत बड़ा है, लेकिन उनका ये भी कहना है ये लक्ष्य इतना बड़ा भी नहीं है, जिसे हासिल न किया जा सके.
सरकार रूफटॉप पीवी के लिए सस्ते कर्ज की व्यस्था करने पर भी काम कर रही है

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय में ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप सोलर पीवी की जिम्मेदारी संभाल रहे अंडर सेक्रेटरी हिरेन चंद्र बोरा के मुताबिक, मंत्रालय पूरे प्रॉसेस को ऑनलाइन करने जा रहा है, जिससे इसे लागू करने में आ रही लाल फीताशाही खत्म हो सके. इसके अलावा, सरकार रूफटॉप पीवी के लिए सस्ते कर्ज की व्यस्था करने पर भी काम कर रही है. इससे रूफटॉप सोलर पीवी को रफ्तार मिलेगी.
बहरहाल, सरकार ने अपना ध्यान देश में हजारों की संख्या में मौजूद सरकारी कार्यालयों पर केंद्रित कर लिया है. मार्च 2017 तक केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों पर रूफटॉप सोलर पीवी लगाने का लक्ष्य है. इस कड़ी में बीते 10 फरवरी को ही राष्ट्रपति एस्टेट में रूफटॉप सोलर पीवी का का पहला चरण शुरू किया गया है. इसमें राष्ट्रपति एस्टेट की सात इमारतों की छतों पर सोलर पैनल के जरिए 670 किलोवाॅट सौर ऊर्जा पैदा की जाएगी.

Thursday, 23 March 2017

5 Ways to Celebrate Earth Day This April 22

With temperatures rising across the Northern Hemisphere, it is imperative that each of us do our bit to save our planet. And what better day than today, Earth Day — a day on which events are held worldwide to demonstrate support for environmental protection. Here are a few simple ways in which we can commemorate this day and be eco-conscious for the rest of the year.


A. Composting

Composting not only recycles kitchen waste, but is also a good soil conditioner. Fruit and vegetable scraps, eggshells, leaves and grass, garden plants, flowers, newspaper, coffee grounds, tea leaves, cardboard and wood chips can all be composted. There are two ways to do it at home — indoors and in the backyard. You can either purchase a bin or make one on your own. Convert a plastic bin with a lid into a compost pit, drill some holes into it and line the inside with a wire mesh to keep rats out. After you have started using it, give the bin a shake every two days or so. If the contents are wet or if there is any unpleasant smell, add some shredded leaves or sawdust to dry it out.

Composting not only recycles kitchen waste, but is also a good soil conditioner



B. Start Your Own Balcony Garden

Many of us may live in apartment complexes, but that doesn't mean we can't have our own little gardens. Make use of your balcony space to set up plants in old watering cans, paint cans or dresser drawers instead of plastic containers. You can grow low-maintenance vegetables like tomatoes, chillies, brinjal or ladies fingers, or plants like tulsi, aloe vera and curry leaves. Remember to place them in spots where they get adequate sunlight, to water them regularly and to use your wet waste as compost or organic fertilisers.

Make use of your balcony space to set up plants in old watering cans, paint cans or dresser drawers instead of plastic containers



C. Rainwater Harvesting



It isn't time for rains yet, but the meteorological department has predicted that we will receive above average rainfall this year, which makes it an ideal time to set up a rainwater harvesting system. This becomes even more important, given that many parts of the state are suffering from drought. In urban areas, rainwater harvesting is the process of collecting, filtering and using rainwater that falls on rooftops (terraces or tile roofs) and in porticos. This can be adopted in two ways — recharging bore wells and groundwater sources and collecting rainwater for reuse. Adopt the system that works best for your home and get it installed by professionals. This will go a long way in ensuring that you have sufficient supply of water.

Adopt the system that works best for your home and get it installed by professionals



D. Plant Saplings

The theme for this year's Earth Day is 'Trees For The Earth', so what better way to mark the day than by planting saplings? But ensure that you plant one at least 20 feet from other trees. Remember not to plant near, above or below ground utilities. Once you've picked the right spot, dig a small hole about six inches wide and as deep as the root ball. Keep the top of the root ball even with the ground and ensure that it is placed on firm soil to prevent sinking. Fill the hole firmly with soil and add compost on top for additional nutrients. Build a mulch ring around the tree, two inches from the trunk. It keeps the soil moist, adds nutrients and improves soil structure. Water the plant three times a week for around two years.

The best time to plant a tree is twenty years ago. The second best time is now.

The best time to plant a tree is twenty years ago. The second best time is now. - See more at: http://www.savatree.com/tree-quotes.html#sthash.kTHinuB5.dpuf


E. Have An Organic Meal

If you're a foodie and love to celebrate special occasions by rustling up a meal for family and friends, then go all out and prepare an organic one. You can source some of the ingredients from your balcony garden if you already have one, or shop for the organic variety and local produce. Prepare your meal in such a way that you use as much of each ingredient as possible. Opt for non-disposable plates, cutlery and napkins to keep the waste minimal.

Celebrate special occasions by rustling up a meal for family and friends, then go all out and prepare an organic one

Wednesday, 22 March 2017

आयुर्वेद के अनुसार दूध पीने के बारे जानिए कुछ सुझाव


1. आयुर्वेद में हैं दूध पीने के कुछ नियम


Image result for आयुर्वेद में हैं दूध पीने के कुछ नियमदूध हमारे खान-पान का बहुत अहम हिस्सा है। यह हमारे शरीर और दिमाग को जरुरी पोषण प्रदान करता है। यह ठंडा, वात और पित्‍त दोष को बैलेंस करने का काम करता है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध सबसे ज्‍यादा पौष्टिक होता है। दूध भूख को शांत करता है और मोटापे से भी छुटकारा दिलाने में मददगार है। लेकिन कुछ लोगों को दूध पीने के बाद हजम नहीं हो पाता। उन्‍हें पेट फूलने या फिर बार खराब होने की समस्‍या से जूझना पड़ता है। पहले ज़माने के मुकाबले आज कल दूध की क्‍वालिटी में गिरावट आने की वजह से ऐसा होता है। यदि आपका पाचन तंत्र मजबूत नहीं है तो भी आपको दूध ठीक से हजम नहीं हो पाएगा। आयुर्वेद के अनुसार दूध पीने के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करने से आपको दूध हजम हो जाएगा।

2. बिना शक्कर मिला दूध

आमतौर पर लोगों की आदत होती है कि दूध में शक्कर मिलाकर पीते हैं। आयुर्वेद का मानना है कि यदि रात में बिना शक्कर मिला दूध पियेंगे तो वह अधिक फायदेमंद होगा।
अगर हो सके तो दूध में गाय का एक या दो चम्मच घी भी मिला लेना चाहिए।आयुर्वेद देसी गाय के दूध के सेवन पर अधिक जोर देता है। आयुर्वेद के अनुसार, देसी गाय का दूध ही सबसे अधिक फायदा देता है। शहरों में इस तरह का दूध ढूंढ पाना थोड़ा मुश्किल तो होता है लेकिन अगर संभव हो तो यही दूध पीना चाहिए। 

 

3. ताजा व जैविक दूध

इन दिनों हमारी जीवनशैली ऐसी है कि हम हर चीज पैकेट वाली इस्तेमाल करने लगे हैं। दूध भी अधिकतर लोग पैकेट वाला ही लेते हैं। पैकेट वाला दूध न ताज़ा होता है और न ही जैविक। आयुर्वेद के अनुसार, ताजा, जैविक और बिना हार्मोन की मिलावट वाला दूध सबसे अच्‍छा होता है। पैकेट में मिलने वाला दूध नहीं पीना चाहिये।कुछ लोगों को कच्चा दूध अच्छा लगता है। फ्रिज से दूध निकालकर बिना उबाले सीधे ही पी जाना सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता। आयुर्वेद मानता है कि दूध को उबालकर, गर्म अवस्था में पीना चाहिए।


4. दूध में लौंग व इलायची


दूध पीने में भारी लग रहा हो तो उसमें थोड़ा पानी मिलाया जा सकता है। ऐसा दूध आसानी से पच भी जाता है।जिन लोगों को दूध हजम नहीं होता उनके लिए दूध पीने का एक और तरीका है। दूध में एक चुटकी अदरक, लौंग, इलायची, केसर, दालचीनी और जायफल आदि की मिलाएं। इससे आपके पेट में अतिरिक्त गर्मी बढ़ेगी जिसकी मदद से दूध हजम होने में आसानी मिलेगी।



5. अच्छी नींद

अक्सर किसी न किसी वजह से हम रात का खाना नहीं खा पाते। आयुर्वेद के अनुसार, ऐसी स्थिति में एक चुटकी जायफल और केसर डाल कर दूध पी लें। इससे नींद भी अच्‍छी आती है और साथ ही शरीर को ऊर्जा भी प्राप्त हो जाती है। अगली बार से जब रात का खाना न खाएं, इस तरह का दूध पी लें।


 

6. नमकीन चीज़ व मछली के साथ दूध का सेवन नहीं

आयुर्वेद का कहना है कि किसी भी नमकीन चीज़ के साथ दूध का सेवन ना करें। क्रीम सूप या फिर चीज़ को नमक के साथ ना खाएं। दूध के साथ खट्टे फल भी नहीं खाने चाहिये। आमतौर पर, दूध इन चीज़ों के साथ मिलकर रिऐक्शन कर जाता है। ये बात आपने कई बार सुनी होगी, कि दूध के साथ मछली का सेवन नहीं करना चाहिए। आयुर्वेद का मानना है कि यदि दूध और मछली का सेवन एक वक्त पर किया जाए तो इससे त्वचा खराब हो जाती है। त्वचा पर सफेद व भूरे धब्बे उबरने लगते हैं।