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| शहरीकरण से नाली-नालों से कीचड़ और प्रदूषण की महामारी का नदियों की तरफ बढ़ा रुख |
एकता सिंह, शोध छात्रा
उद्योगों ने जहां विकास के नए रास्ते खोले, वहीं खुशहाली के लिए कुदरती विरासत में मिले साफ पानी के ठिकानों को मैला करने का दंश भी बढ़ाया है। कारखानों, औद्योगिक इकाइयों के कचरे के साथ साथ शहरीकरण से नाली-नालों का नदियों की तरफ बढ़ा रुख देखते-देखते पानी के मूल स्वरूप को लील गया। सिकुड़ती नदियां कीचड़ और प्रदूषण की महामारी का शिकार होती रहीं। नतीजे में पीना तो दूर पानी नहाने लायक भी नहीं बचा। मछली व अन्य जल जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पहुंच चुका है। राप्ती बेरौनक है तो आमी सबसे ज्यादा बदहाल है।
गीडा, रुधौली, मगहर, खलीलाबाद की इकाइयों में ट्रीटमेंट प्लांट की बातें बातों तक सीमित रहने से न सिर्फ प्रमुख नदियां अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हैं बल्कि नदियों के किनारे भूगर्भ जल से लेकर वातावरण तक संक्रमण की सेंध लग चुकी है। आम लोगों की जागरूकता भरी पहल ही जलधार पर जहर की मार को रोक सकती है और जिम्मेदार विभाग और अफसरों को अपने हिस्से के काम को नतीजों तक पहुंचाने के लिए मजबूर कर सकती है।
गंगा को भी प्रदूषित कर रहीं आमी-राप्ती
सहायक नदियों की दशा सुधारे बिना गंगा को सार्थक बनाने की दिशा के प्रयास कामयाबी की मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। राप्ती और आमी का बिगड़ा स्वरूप भी गंगा पर असर डाल रहा है। आमी सोहगौरा में राप्ती में मिलती है तो राप्ती पटना घाट पर घाघरा में। बलिया में घाघरा और गंगा का मिलन होता है। जाहिर है गंगा से जुड़ी श्रद्धा और सम्मान को बनाए रखने के लिए भी राप्ती और आमी को बचाने की पहल करनी होगी।
छिनी मछुआरों की आजीविका
सहायक नदियों की दशा सुधारे बिना गंगा को सार्थक बनाने की दिशा के प्रयास कामयाबी की मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। राप्ती और आमी का बिगड़ा स्वरूप भी गंगा पर असर डाल रहा है। आमी सोहगौरा में राप्ती में मिलती है तो राप्ती पटना घाट पर घाघरा में। बलिया में घाघरा और गंगा का मिलन होता है। जाहिर है गंगा से जुड़ी श्रद्धा और सम्मान को बनाए रखने के लिए भी राप्ती और आमी को बचाने की पहल करनी होगी।
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| नदियों में तेजी से घट रही घुलनशील ऑक्सीजन |
छिनी मछुआरों की आजीविका
बढ़ते प्रदूषण से नदियों में तेजी से घट रही घुलनशील ऑक्सीजन ने जहां राप्ती और आमी की कुदरती कल-कल छीन ली, वहीं जलीय जंतुओं की अटखेलियां भी पहले जैसी नहीं बचीं। यही वजह है कि नदियों के जरिए घर-परिवार चलाने वाले मल्लाह-मछुआरों में से तमाम के आगे आजीविका का बढ़ा संकट खड़ा हो गया। जानकार बताते हैं कि आमी में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर 4 मिलीग्राम प्रति लीटर के न्यूनतम मानक से भी न्यून स्तर पर पहुंच गया है।
आमी, राप्ती और रोहिणी के पानी पर आधारित शोध में नदियों ही नहीं आसपास की आबादी तक खतनाक बैक्टीरिया की मौजूदगी देखी गई। नदियों में अकार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से शैवाल बढ़े हैं। नदियों के पानी का बढ़ता तापमान जलीय जंतुओं के जीवन को सबसे बड़ा खतरा है।
-एकता सिंह, शोध छात्रा


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